Posts

Showing posts from 2016

नाइन इलेवन / लाल्टू

वह दुनिया की सबसे ऊँची छत थी वहाँ मैं एक औरत को बाँहो में थामे उसके होंठ चूम रहा था किसी बाल्मीकि ने पढा नहीं श्लोक जब तुम आए हमारा शिकार करने हम अचानक ही गिरे जब वह छत हिली एकबारगी मुझे लगा था कि किसी मर्द ने ईर्ष्या से धकेल दिया है मुझे मैं अपने सीने में साँस भर कर उठने को था जब मैं गिरता ही चला मेर चारों ओर तुम्हारा धुँआ था यह कविता की शुरआत नहीं यह कविता का अंत था हमें बहुत देर तक मौका नही मिला कि हम देखते कविता की वह हत्या मेरी स्मृति से जल्द ही उतर गई थी वह औरत जिसे मैं बहुत चाहता था आखिरी क्षणों मे मेरे होठों पर था उसका स्वाद जब तुम दे रहे थे अल्लाह को दुहाई धुँआ फैल रहा था सारा आकाश धुँआ धुँआ था कितनी देर मुझे याद रहा कि मैं कौन हूँ मैंने सोचा भी कि नहीं कि मैं एक जिहाद का नाम हूँ मेर जल रहे होंठ जिनमें जल चुकी थी एक इंसान की चाहत यह कहने के काबिल न थे कि मैं किसी को ढूँढ रहा हूँ वह दुनिया की सबसे ऊँची छत थी मेर जीते जी हुई धवस्त मेर बाद भी बची रह गई थी धरती जिस पर जलने थे अभी और अनिगनत होंठ या अल्लाह!

आत्‍मकथ्‍य / जयशंकर प्रसाद

मधुप गुन-गुनाकर कह जाता कौन कहानी अपनी यह, मुरझाकर गिर रहीं पत्तियाँ देखो कितनी आज घनी। इस गंभीर अनंत-नीलिमा में असंख्‍य जीवन-इतिहास यह लो, करते ही रहते हैं अपने व्‍यंग्‍य मलिन उपहास तब भी कहते हो-कह डालूँ दुर्बलता अपनी बीती। तुम सुनकर सुख पाओगे, देखोगे-यह गागर रीती। किंतु कहीं ऐसा न हो कि तुम ही खाली करने वाले- अपने को समझो, मेरा रस ले अपनी भरने वाले। यह विडंबना! अरी सरलते हँसी तेरी उड़ाऊँ मैं। भूलें अपनी या प्रवंचना औरों की दिखलाऊँ मैं। उज्‍ज्‍वल गाथा कैसे गाऊँ, मधुर चाँदनी रातों की। अरे खिल-खिलाकर हँसतने वाली उन बातों की। मिला कहाँ वह सुख जिसका मैं स्‍वप्‍न देकर जाग गया। आलिंगन में आते-आते मुसक्‍या कर जो भाग गया। जिसके अरूण-कपोलों की मतवाली सुन्‍दर छाया में। अनुरागिनी उषा लेती थी निज सुहाग मधुमाया में। उसकी स्‍मृति पाथेय बनी है थके पथिक की पंथा की। सीवन को उधेड़ कर देखोगे क्‍यों मेरी कंथा की? छोटे से जीवन की कैसे बड़े कथाएँ आज कहूँ? क्‍या यह अच्‍छा नहीं कि औरों की सुनता मैं मौन रहूँ? सुनकर क्‍या तुम भला करोगे मेरी भोली आत्‍मकथा? अभी सम...

बीती विभावरी जाग री / जयशंकर प्रसाद

बीती विभावरी जाग री! अम्बर पनघट में डुबो रही तारा-घट ऊषा नागरी! खग-कुल कुल-कुल-सा बोल रहा किसलय का अंचल डोल रहा लो यह लतिका भी भर ला‌ई- मधु मुकुल नवल रस गागरी अधरों में राग अमंद पिए अलकों में मलयज बंद किए तू अब तक सो‌ई है आली आँखों में भरे विहाग री!

हम को मन की शक्ति देना / गुलज़ार

हम को मन की शक्ति देना, मन विजय करें दूसरो की जय से पहले, ख़ुद को जय करें।  भेद भाव अपने दिल से साफ कर सकें दोस्तों से भूल हो तो माफ़ कर सके झूठ से बचे रहें, सच का दम भरें दूसरो की जय से पहले ख़ुद को जय करें हमको मन की शक्ति देना।  मुश्किलें पड़े तो हम पे, इतना कर्म कर साथ दें तो धर्म का चलें तो धर्म पर ख़ुद पर हौसला रहें बदी से न डरें दूसरों की जय से पहले ख़ुद को जय करें हमको मन की शक्ति देना, मन विजय करें।

मधुशाला / भाग १ / हरिवंशराय बच्चन

मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला, प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला, पहले भोग लगा लूँ तेरा फिर प्रसाद जग पाएगा, सबसे पहले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला।।१।  प्यास तुझे तो, विश्व तपाकर पूर्ण निकालूँगा हाला, एक पाँव से साकी बनकर नाचूँगा लेकर प्याला, जीवन की मधुता तो तेरे ऊपर कब का वार चुका, आज निछावर कर दूँगा मैं तुझ पर जग की मधुशाला।।२। प्रियतम, तू मेरी हाला है, मैं तेरा प्यासा प्याला, अपने को मुझमें भरकर तू बनता है पीनेवाला, मैं तुझको छक छलका करता, मस्त मुझे पी तू होता, एक दूसरे की हम दोनों आज परस्पर मधुशाला।।३। भावुकता अंगूर लता से खींच कल्पना की हाला, कवि साकी बनकर आया है भरकर कविता का प्याला, कभी न कण-भर खाली होगा लाख पिएँ, दो लाख पिएँ! पाठकगण हैं पीनेवाले, पुस्तक मेरी मधुशाला।।४। मधुर भावनाओं की सुमधुर नित्य बनाता हूँ हाला, भरता हूँ इस मधु से अपने अंतर का प्यासा प्याला, उठा कल्पना के हाथों से स्वयं उसे पी जाता हूँ, अपने ही में हूँ मैं साकी, पीनेवाला, मधुशाला।।५। मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवाला, 'किस पथ से जाऊँ?' असमंजस में है वह भोलाभा...

सरफ़रोशी की तमन्ना / बिस्मिल अज़ीमाबादी

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-कातिल में है करता नहीं क्यूँ दूसरा कुछ बातचीत, देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफ़िल में है ए शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार, अब तेरी हिम्मत का चरचा गैर की महफ़िल में है सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमान, हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है खैंच कर लायी है सब को कत्ल होने की उम्मीद, आशिकों का आज जमघट कूच-ए-कातिल में है सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

शुमार-ए सुबह मरग़ूब-ए बुत-ए-मुश्किल पसंद आया / ग़ालिब

शुमार-ए सुबह मरग़ूब-ए बुत-ए-मुश्किल पसंद आया तमाशा-ए बयक-कफ़ बुरदन-ए सद दिल पसंद आया ब फ़ैज़-ए बे-दिली नौमीदी-ए जावेद आसां है कुशायिश को हमारा `उक़द-ए मुश्किल पसंद आया हवा-ए सैर-ए गुल आईना-ए बे-मिहरी-ए क़ातिल कि अंदाज़-ए ब ख़ूं-ग़लतीदन-ए बिस्मिल पसंद आया रवानियाँ -ए मौज-ए ख़ून-ए बिस्मिल से टपकता है कि लुतफ़-ए बे-तहाशा-रफ़तन-ए क़ातिल पसंद आया असद हर जा सुख़न ने तरह-ए बाग़-ए-तज़ डाली है मुझे रंग-ए बहार-ईजादी-ए बेदिल पसंद आया

नाम बड़े, दर्शन छोटे / काका हाथरसी

नाम-रूप के भेद पर कभी किया है गौर ? नाम मिला कुछ और तो, शक्ल-अक्ल कुछ और शक्ल-अक्ल कुछ और, नैनसुख देखे काने बाबू सुंदरलाल बनाए ऐंचकताने कहँ ‘काका’ कवि, दयाराम जी मारें मच्छर विद्याधर को भैंस बराबर काला अक्षर मुंशी चंदालाल का तारकोल-सा रूप श्यामलाल का रंग है जैसे खिलती धूप जैसे खिलती धूप, सजे बुश्शर्ट पैंट में- ज्ञानचंद छै बार फेल हो गए टैंथ में कहँ ‘काका’ ज्वालाप्रसाद जी बिल्कुल ठंडे पंडित शांतिस्वरूप चलाते देखे डंडे देख, अशर्फीलाल के घर में टूटी खाट सेठ भिखारीदास के मील चल रहे आठ मील चल रहे आठ, कर्म के मिटें न लेखे धनीराम जी हमने प्राय: निर्धन देखे कहँ ‘काका’ कवि, दूल्हेराम मर गए क्वाँरे बिना प्रियतमा तड़पें प्रीतमसिंह बिचारे दीन श्रमिक भड़का दिए, करवा दी हड़ताल मिल-मालिक से खा गए रिश्वत दीनदयाल रिश्वत दीनदयाल, करम को ठोंक रहे हैं ठाकुर शेरसिंह पर कुत्ते भौंक रहे हैं ‘काका’ छै फिट लंबे छोटूराम बनाए नाम दिगंबरसिंह वस्त्र ग्यारह लटकाए पेट न अपना भर सके जीवन-भर जगपाल बिना सूँड़ के सैकड़ों मिलें गणेशीलाल मिलें गणेशीलाल, पैंट की क्रीज सम्हारी- बैग कुली को दिया चले मिस्टर गिरि...

मानव का मन शान्त करो हे / सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"

मानव का मन शान्त करो हे! काम, क्रोध, मद, लोभ दम्भ से जीवन को एकान्त करो हे। हिलें वासना-कृष्ण-तृष्ण उर, खिलें विटप छाया-जल-सुमधुर, गूंजे अलि-गुंजन के नूपुर, निज-पुर-सीमा-प्रान्त करो हे। विहग-विहग नव गगन हिला दे, गान खुले-कण्ठ-स्वर गा दे, नभ-नभ कानन-कानन छा दे, ऐसे तुम निष्क्रान्त करो हे। रूखे-मुख की रेखा सोये, फूट-फूटकर माया रोये, मानस-सलिल-मलिनता धोये, प्रति मग से आक्रान्त करो हे!

न दैन्यं न पलायनम्. / अटल बिहारी वाजपेयी

कर्तव्य के पुनीत पथ को  हमने स्वेद से सींचा है,  कभी-कभी अपने अश्रु और—  प्राणों का अर्ध्य भी दिया है।  किंतु, अपनी ध्येय-यात्रा में—  हम कभी रुके नहीं हैं।  किसी चुनौती के सम्मुख  कभी झुके नहीं हैं।  आज,  जब कि राष्ट्र-जीवन की  समस्त निधियाँ,  दाँव पर लगी हैं,  और,  एक घनीभूत अंधेरा—  हमारे जीवन के  सारे आलोक को  निगल लेना चाहता है;  हमें ध्येय के लिए  जीने, जूझने और  आवश्यकता पड़ने पर—  मरने के संकल्प को दोहराना है।  आग्नेय परीक्षा की  इस घड़ी में—  आइए, अर्जुन की तरह  उद्घोष करें :  ‘‘न दैन्यं न पलायनम्।’’

उन्हें शौक़-ए-इबादत भी है / अकबर इलाहाबादी

उन्हें शौक़-ए-इबादत भी है और गाने की आदत भी निकलती हैं दुआऐं उनके मुंह से ठुमरियाँ होकर  तअल्लुक़ आशिक़-ओ-माशूक़ का तो लुत्फ़ रखता था मज़े अब वो कहाँ बाक़ी रहे बीबी मियाँ होकर  न थी मुतलक़ तव्क़्क़ो बिल बनाकर पेश कर दोगे  मेरी जाँ लुट गया मैं तो तुम्हारा मेहमाँ होकर  हक़ीक़त में मैं एक बुलबुल हूँ मगर चारे की ख़्वाहिश में  बना हूँ मिमबर-ए-कोंसिल यहाँ मिट्ठू मियाँ होकर निकाला करती है घर से ये कहकर तू तो मजनूं है  सता रक्खा है मुझको सास ने लैला की माँ होकर

प्यार जब जिस्म की चीखों में दफ़न हो जाये / कुमार विश्वास

प्यार जब जिस्म की चीखों में दफ़न हो जाए, ओढ़नी इस तरह उलझे कि कफ़न हो जाए, घर के एहसास जब बाजार की शर्तो में ढले, अजनबी लोग जब हमराह बन के साथ चले, लबों से आसमां तक सबकी दुआ चुक जाए, भीड़ का शोर जब कानो के पास रुक जाए, सितम की मारी हुई वक्त की इन आँखों में, नमी हो लाख मगर फिर भी मुस्कुराएंगे, अँधेरे वक्त में भी गीत गाये जायेंगे... लोग कहते रहें इस रात की सुबह ही नहीं, कह दे सूरज कि रौशनी का तजुर्बा ही नहीं, वो लड़ाई को भले आर पार ले जाएँ, लोहा ले जाएँ वो लोहे की धार ले जाएँ, जिसकी चौखट से तराजू तक हो उन पर गिरवी उस अदालत में हमें बार बार ले जाएँ हम अगर गुनगुना भी देंगे तो वो सब के सब हम को कागज पे हरा के भी हार जायेंगे अँधेरे वक्त में भी गीत गाए जायेंगे...

ज़िंदगी यूँ भी जली, यूँ भी जली मीलों तक / कुँअर बेचैन

ज़िंदगी यूँ भी जली, यूँ भी जली मीलों तक चाँदनी चार क‍़दम, धूप चली मीलों तक प्यार का गाँव अजब गाँव है जिसमें अक्सर ख़त्म होती ही नहीं दुख की गली मीलों तक प्यार में कैसी थकन कहके ये घर से निकली कृष्ण की खोज में वृषभानु-लली मीलों तक घर से निकला तो चली साथ में बिटिया की हँसी ख़ुशबुएँ देती रही नन्हीं कली मीलों तक माँ के आँचल से जो लिपटी तो घुमड़कर बरसी मेरी पलकों में जो इक पीर पली मीलों तक मैं हुआ चुप तो कोई और उधर बोल उठा बात यह है कि तेरी बात चली मीलों तक हम तुम्हारे हैं 'कुँअर' उसने कहा था इक दिन मन में घुलती रही मिसरी की डली मीलों तक

कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तेरा / इब्ने इंशा

कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तेरा। कुछ ने कहा ये चाँद है कुछ ने कहा चेहरा तेरा। हम भी वहीं मौजूद थे, हम से भी सब पूछा किए, हम हँस दिए, हम चुप रहे, मंज़ूर था परदा तेरा। इस शहर में किस से मिलें हम से तो छूटी महिफ़लें, हर शख़्स तेरा नाम ले, हर शख़्स दीवाना तेरा। कूचे को तेरे छोड़ कर जोगी ही बन जाएँ मगर, जंगल तेरे, पर्वत तेरे, बस्ती तेरी, सहरा तेरा। तू बेवफ़ा तू मेहरबाँ हम और तुझ से बद-गुमाँ, हम ने तो पूछा था ज़रा ये वक्त क्यूँ ठहरा तेरा। हम पर ये सख़्ती की नज़र हम हैं फ़क़ीर-ए-रहगुज़र, रस्ता कभी रोका तेरा दामन कभी थामा तेरा। दो अश्क जाने किस लिए, पलकों पे आ कर टिक गए, अल्ताफ़ की बारिश तेरी अक्राम का दरिया तेरा। हाँ हाँ, तेरी सूरत हँसी, लेकिन तू ऐसा भी नहीं, इस शख़्स के अश‍आर से, शोहरा हुआ क्या-क्या तेरा। बेशक, उसी का दोष है, कहता नहीं ख़ामोश है, तू आप कर ऐसी दवा बीमार हो अच्छा तेरा। बेदर्द, सुननी हो तो चल, कहता है क्या अच्छी ग़ज़ल, आशिक़ तेरा, रुसवा तेरा, शायर तेरा, 'इन्शा' तेरा।

मदारी की लड़की / भारतेन्दु मिश्र

मदारी की लड़की सपनों की किरचों पर  नाच रही लड़की ।  अपने ही  झोंक रहे चूल्हे की आग में रोटी-पानी ही तो है इसके  भाग में संबंधों के अलाव ताप  रही लड़की । ड्योढ़ी की  सीमाएँ लाँघ नहीं पाई है  आज भी मदारी से बहुत मार  खाई है तने हुए तारों पर काँप  रही लड़की ।  तुलसी के  चौरे पर आरती सजाए है  अपनी उलझी लट को फिर फिर  सुलझाए है  बचपन से रामायन बाँच  रही लड़की ।

हिंदी की दुर्दशा / काका हाथरसी

बटुकदत्त से कह रहे, लटुकदत्त आचार्य सुना? रूस में हो गई है हिंदी अनिवार्य है हिंदी अनिवार्य, राष्ट्रभाषा के चाचा- बनने वालों के मुँह पर क्या पड़ा तमाचा कहँ 'काका', जो ऐश कर रहे रजधानी में नहीं डूब सकते क्या चुल्लू भर पानी में पुत्र छदम्मीलाल से, बोले श्री मनहूस हिंदी पढ़नी होये तो, जाओ बेटे रूस जाओ बेटे रूस, भली आई आज़ादी इंग्लिश रानी हुई हिंद में, हिंदी बाँदी कहँ 'काका' कविराय, ध्येय को भेजो लानत अवसरवादी बनो, स्वार्थ की करो वक़ालत

रात अकेली न थी / लाल्टू

रात अकेली न थी जैसे सचमुच कोई न था रात के साथ एक एक अनेक सपने थे हर सपना जानता था कि तारे भी हैं सपने अकेले न थे जैसे सचमुच कोई तारा न था किसी सपने के साथ ग़म भी अकेले न थे सुबह और तेज़ धूप साथ-साथ जैसे सचमुच धूप न थी सुबह के साथ तुम्हारा निर्णय और तुम साथ आए दोनों को जाना ही था साथ जब से तुम गई हो आती हो तुम हर रात जैसे सचमुच तुम नहीं आती हो मैं दरवाज़ों की ओर जाना चाहकर भी नहीं जाता बारिश होती है तुम्हारे साथ जैसे कोई बारिश सचमुच नहीं होती मैं सचमुच तुम्हें लेने बाहर नहीं आता अन्दर वापस जाता हूँ जैसे सचमुच नहीं जाता वे दिन जो थे सच थे अकेले होते थे हम साथ साथ रातें थीं ग़मज़दा जब लेते थे ख़ुशियाँ बाँट नींद होती थी वह भी रात जब तुम नहीं होती थी साथ तुम कहाँ किधर होती थी हमेशा मुझे पता न होता था अकेले होते थे हम साथ-साथ अकेलापन था धरती का साथ तेज़ धूप में तपता है कमरा गर्म हवा हल्की हो गई है इतनी हर साँस भारी होती जाती है साँस की दूरी बढ़ती है सुबह-सुबह कोई रोता है जैसे सचमुच सुबह कोई नहीं रोता है ।