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Showing posts from July, 2017

रात के ख्वाब सुनाएं किस को रात के ख्वाब सुहाने थे / इब्ने इंशा

रात के ख्वाब सुनाए किस को रात के ख्वाब सुहाने थे| धुंधले धुंधले चेहरे थे पर सब जाने पहचाने थे| जिद्दी वहशी अल्हड़ चंचल मीठे लोग रसीले लोग, होंठ उन के ग़ज़लों के मिसरे आंखों में अफ़साने थे| ये लड़की तो इन गलियों में रोज़ ही घूमा करती थी, इस से उन को मिलना था तो इस के लाख बहाने थे| हम को सारी रात जगाया जलते बुझते तारों ने, हम क्यूं उन के दर पे उतरे कितने और ठिकाने थे| वहशत की उन्वान हमारी इन में से जो नार बनी, देखेंगे तो लोग कहेंगे 'इन्शा' जी दीवाने थे|
हिमालय के आँगन में उसे, प्रथम किरणों का दे उपहार  उषा ने हँस अभिनंदन किया, और पहनाया हीरक-हार  जगे हम, लगे जगाने विश्व, लोक में फैला फिर आलोक  व्योम-तुम पुँज हुआ तब नाश, अखिल संसृति हो उठी अशोक  विमल वाणी ने वीणा ली, कमल कोमल कर में सप्रीत  सप्तस्वर सप्तसिंधु में उठे, छिड़ा तब मधुर साम-संगीत  बचाकर बीच रूप से सृष्टि, नाव पर झेल प्रलय का शीत  अरुण-केतन लेकर निज हाथ, वरुण-पथ में हम बढ़े अभीत  सुना है वह दधीचि का त्याग, हमारी जातीयता का विकास  पुरंदर ने पवि से है लिखा, अस्थि-युग का मेरा इतिहास  सिंधु-सा विस्तृत और अथाह, एक निर्वासित का उत्साह  दे रही अभी दिखाई भग्न, मग्न रत्नाकर में वह राह  धर्म का ले लेकर जो नाम, हुआ करती बलि कर दी बंद  हमीं ने दिया शांति-संदेश, सुखी होते देकर आनंद  विजय केवल लोहे की नहीं, धर्म की रही धरा पर धूम  भिक्षु होकर रहते सम्राट, दया दिखलाते घर-घर घूम  यवन को दिया दया का दान, चीन को मिली धर्म की दृष्टि  मिला था स्वर्ण-भूमि को रत्न, शील की सिंहल को भी सृष्टि...

भारत महिमा / जयशंकर प्रसाद

हिमालय के आँगन में उसे, प्रथम किरणों का दे उपहार  उषा ने हँस अभिनंदन किया, और पहनाया हीरक-हार  जगे हम, लगे जगाने विश्व, लोक में फैला फिर आलोक  व्योम-तुम पुँज हुआ तब नाश, अखिल संसृति हो उठी अशोक  विमल वाणी ने वीणा ली, कमल कोमल कर में सप्रीत  सप्तस्वर सप्तसिंधु में उठे, छिड़ा तब मधुर साम-संगीत  बचाकर बीच रूप से सृष्टि, नाव पर झेल प्रलय का शीत  अरुण-केतन लेकर निज हाथ, वरुण-पथ में हम बढ़े अभीत  सुना है वह दधीचि का त्याग, हमारी जातीयता का विकास  पुरंदर ने पवि से है लिखा, अस्थि-युग का मेरा इतिहास  सिंधु-सा विस्तृत और अथाह, एक निर्वासित का उत्साह  दे रही अभी दिखाई भग्न, मग्न रत्नाकर में वह राह  धर्म का ले लेकर जो नाम, हुआ करती बलि कर दी बंद  हमीं ने दिया शांति-संदेश, सुखी होते देकर आनंद  विजय केवल लोहे की नहीं, धर्म की रही धरा पर धूम  भिक्षु होकर रहते सम्राट, दया दिखलाते घर-घर घूम  यवन को दिया दया का दान, चीन को मिली धर्म की दृष्टि  मिला था स्वर्ण-भूमि को रत्न, शील की सिंहल को भी सृष्टि  किसी क...

अजब था उसकी दिलज़ारी का अन्दाज़ / जॉन एलिया

अजब था उसकी दिलज़ारी का अन्दाज़ वो बरसों बाद जब मुझ से मिला है भला मैं पूछता उससे तो कैसे मताए-जां तुम्हारा नाम क्या है? साल-हा-साल और एक लम्हा कोई भी तो न इनमें बल आया खुद ही एक दर पे मैंने दस्तक दी खुद ही लड़का सा मैं निकल आया दौर-ए-वाबस्तगी गुज़ार के मैं अहद-ए-वाबस्तगी को भूल गया यानी तुम वो हो, वाकई, हद है मैं तो सचमुच सभी को भूल गया रिश्ता-ए-दिल तेरे ज़माने में रस्म ही क्या निबाहनी होती मुस्कुराए हम उससे मिलते वक्त रो न पड़ते अगर खुशी होती दिल में जिनका निशान भी न रहा क्यूं न चेहरों पे अब वो रंग खिलें अब तो खाली है रूह, जज़्बों से अब भी क्या हम तपाक से न मिलें शर्म, दहशत, झिझक, परेशानी नाज़ से काम क्यों नहीं लेतीं आप, वो, जी, मगर ये सब क्या है तुम मेरा नाम क्यों नहीं लेतीं 

लाई फिर इक लग़्ज़िशे-मस्ताना तेरे शहर में / कैफ़ी आज़मी

लाई फिर इक लग़्ज़िशे-मस्तानामादक लड़खड़ाहट तेरे शहर में । फिर बनेंगी मस्जिदें मयख़ाना तेरे शहर में । आज फिर टूटेंगी तेरे घर की नाज़ुक खिड़कियाँ आज फिर देखा गया दीवाना तेरे शहर में । जुर्म है तेरी गली से सर झुकाकर लौटना कुफ़्रधर्मविरोधी है पथराव से घबराना तेरे शहर में । शाहनामेफ़ारसी कवि फ़िरदौसी की अमर रचना लिक्खे हैं खंडरात की हर ईंट पर हर जगह है दफ़्न इक अफ़साना तेरे शहर में । कुछ कनीज़ेंदासियाँ जो हरीमे-नाज़प्रेमिका का घर में हैं बारयाबजिसे प्रवेश मिल गया हो माँगती हैं जानो-दिल नज़्राना तेरे शहर में । नंगी सड़कों पर भटककर देख, जब मरती है रात रेंगता है हर तरफ़ वीराना तेरे शहर में ।