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Showing posts from September, 2016

प्यार जब जिस्म की चीखों में दफ़न हो जाये / कुमार विश्वास

प्यार जब जिस्म की चीखों में दफ़न हो जाए, ओढ़नी इस तरह उलझे कि कफ़न हो जाए, घर के एहसास जब बाजार की शर्तो में ढले, अजनबी लोग जब हमराह बन के साथ चले, लबों से आसमां तक सबकी दुआ चुक जाए, भीड़ का शोर जब कानो के पास रुक जाए, सितम की मारी हुई वक्त की इन आँखों में, नमी हो लाख मगर फिर भी मुस्कुराएंगे, अँधेरे वक्त में भी गीत गाये जायेंगे... लोग कहते रहें इस रात की सुबह ही नहीं, कह दे सूरज कि रौशनी का तजुर्बा ही नहीं, वो लड़ाई को भले आर पार ले जाएँ, लोहा ले जाएँ वो लोहे की धार ले जाएँ, जिसकी चौखट से तराजू तक हो उन पर गिरवी उस अदालत में हमें बार बार ले जाएँ हम अगर गुनगुना भी देंगे तो वो सब के सब हम को कागज पे हरा के भी हार जायेंगे अँधेरे वक्त में भी गीत गाए जायेंगे...

ज़िंदगी यूँ भी जली, यूँ भी जली मीलों तक / कुँअर बेचैन

ज़िंदगी यूँ भी जली, यूँ भी जली मीलों तक चाँदनी चार क‍़दम, धूप चली मीलों तक प्यार का गाँव अजब गाँव है जिसमें अक्सर ख़त्म होती ही नहीं दुख की गली मीलों तक प्यार में कैसी थकन कहके ये घर से निकली कृष्ण की खोज में वृषभानु-लली मीलों तक घर से निकला तो चली साथ में बिटिया की हँसी ख़ुशबुएँ देती रही नन्हीं कली मीलों तक माँ के आँचल से जो लिपटी तो घुमड़कर बरसी मेरी पलकों में जो इक पीर पली मीलों तक मैं हुआ चुप तो कोई और उधर बोल उठा बात यह है कि तेरी बात चली मीलों तक हम तुम्हारे हैं 'कुँअर' उसने कहा था इक दिन मन में घुलती रही मिसरी की डली मीलों तक

कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तेरा / इब्ने इंशा

कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तेरा। कुछ ने कहा ये चाँद है कुछ ने कहा चेहरा तेरा। हम भी वहीं मौजूद थे, हम से भी सब पूछा किए, हम हँस दिए, हम चुप रहे, मंज़ूर था परदा तेरा। इस शहर में किस से मिलें हम से तो छूटी महिफ़लें, हर शख़्स तेरा नाम ले, हर शख़्स दीवाना तेरा। कूचे को तेरे छोड़ कर जोगी ही बन जाएँ मगर, जंगल तेरे, पर्वत तेरे, बस्ती तेरी, सहरा तेरा। तू बेवफ़ा तू मेहरबाँ हम और तुझ से बद-गुमाँ, हम ने तो पूछा था ज़रा ये वक्त क्यूँ ठहरा तेरा। हम पर ये सख़्ती की नज़र हम हैं फ़क़ीर-ए-रहगुज़र, रस्ता कभी रोका तेरा दामन कभी थामा तेरा। दो अश्क जाने किस लिए, पलकों पे आ कर टिक गए, अल्ताफ़ की बारिश तेरी अक्राम का दरिया तेरा। हाँ हाँ, तेरी सूरत हँसी, लेकिन तू ऐसा भी नहीं, इस शख़्स के अश‍आर से, शोहरा हुआ क्या-क्या तेरा। बेशक, उसी का दोष है, कहता नहीं ख़ामोश है, तू आप कर ऐसी दवा बीमार हो अच्छा तेरा। बेदर्द, सुननी हो तो चल, कहता है क्या अच्छी ग़ज़ल, आशिक़ तेरा, रुसवा तेरा, शायर तेरा, 'इन्शा' तेरा।

मदारी की लड़की / भारतेन्दु मिश्र

मदारी की लड़की सपनों की किरचों पर  नाच रही लड़की ।  अपने ही  झोंक रहे चूल्हे की आग में रोटी-पानी ही तो है इसके  भाग में संबंधों के अलाव ताप  रही लड़की । ड्योढ़ी की  सीमाएँ लाँघ नहीं पाई है  आज भी मदारी से बहुत मार  खाई है तने हुए तारों पर काँप  रही लड़की ।  तुलसी के  चौरे पर आरती सजाए है  अपनी उलझी लट को फिर फिर  सुलझाए है  बचपन से रामायन बाँच  रही लड़की ।

हिंदी की दुर्दशा / काका हाथरसी

बटुकदत्त से कह रहे, लटुकदत्त आचार्य सुना? रूस में हो गई है हिंदी अनिवार्य है हिंदी अनिवार्य, राष्ट्रभाषा के चाचा- बनने वालों के मुँह पर क्या पड़ा तमाचा कहँ 'काका', जो ऐश कर रहे रजधानी में नहीं डूब सकते क्या चुल्लू भर पानी में पुत्र छदम्मीलाल से, बोले श्री मनहूस हिंदी पढ़नी होये तो, जाओ बेटे रूस जाओ बेटे रूस, भली आई आज़ादी इंग्लिश रानी हुई हिंद में, हिंदी बाँदी कहँ 'काका' कविराय, ध्येय को भेजो लानत अवसरवादी बनो, स्वार्थ की करो वक़ालत

रात अकेली न थी / लाल्टू

रात अकेली न थी जैसे सचमुच कोई न था रात के साथ एक एक अनेक सपने थे हर सपना जानता था कि तारे भी हैं सपने अकेले न थे जैसे सचमुच कोई तारा न था किसी सपने के साथ ग़म भी अकेले न थे सुबह और तेज़ धूप साथ-साथ जैसे सचमुच धूप न थी सुबह के साथ तुम्हारा निर्णय और तुम साथ आए दोनों को जाना ही था साथ जब से तुम गई हो आती हो तुम हर रात जैसे सचमुच तुम नहीं आती हो मैं दरवाज़ों की ओर जाना चाहकर भी नहीं जाता बारिश होती है तुम्हारे साथ जैसे कोई बारिश सचमुच नहीं होती मैं सचमुच तुम्हें लेने बाहर नहीं आता अन्दर वापस जाता हूँ जैसे सचमुच नहीं जाता वे दिन जो थे सच थे अकेले होते थे हम साथ साथ रातें थीं ग़मज़दा जब लेते थे ख़ुशियाँ बाँट नींद होती थी वह भी रात जब तुम नहीं होती थी साथ तुम कहाँ किधर होती थी हमेशा मुझे पता न होता था अकेले होते थे हम साथ-साथ अकेलापन था धरती का साथ तेज़ धूप में तपता है कमरा गर्म हवा हल्की हो गई है इतनी हर साँस भारी होती जाती है साँस की दूरी बढ़ती है सुबह-सुबह कोई रोता है जैसे सचमुच सुबह कोई नहीं रोता है ।

हंगामा है क्यूँ बरपा / अकबर इलाहाबादी

हंगामा है क्यूँ बरपा, थोड़ी सी जो पी ली है डाका तो नहीं डाला, चोरी तो नहीं की है ना-तजुर्बाकारी से, वाइज़ [1]  की ये बातें हैं इस रंग को क्या जाने, पूछो तो कभी पी है उस मय से नहीं मतलब, दिल जिस से है बेगाना मक़सूद [2]  है उस मय से, दिल ही में जो खिंचती है वां [3]  दिल में कि दो सदमे,यां [4]  जी में कि सब सह लो उन का भी अजब दिल है, मेरा भी अजब जी है हर ज़र्रा चमकता है, अनवर-ए-इलाही [5]  से हर साँस ये कहती है, कि हम हैं तो ख़ुदा भी है सूरज में लगे धब्बा, फ़ितरत [6]  के करिश्मे हैं बुत हम को कहें काफ़िर, अल्लाह की मर्ज़ी है

साये में धूप / दुष्यंत कुमार

कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हर एक घर के लिए कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए  यहाँ दरख़तों के साये में धूप लगती है चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए  न हो कमीज़ तो पाँओं से पेट ढँक लेंगे ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए  ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए  वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिए  तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान शायर की ये एहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए  जिएँ तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिए