अधूरा इश्क / मनीष सोनी

प्रेम ने दो अलग धर्मों को एक धागे में पिरोया था, 
इक प्यार में था तो दूजा इश्क में। 

कसमें हुई, वादे हुए, दुआएँ हुई, वो मोहब्बत का खूबसूरत दौर था, 
अब "मैं" का हिस्सा वो दोनों थे। 

उन सालों को उन्होंने जमानों की तरह जिया था, 
हर पल एक-दूसरे के ख्यालों में खोए रहना, हँसी-ठिठोलियाँ और कुछेक प्यारी तकरारों, इन्हीं में निकल जाता था पूरा दिन। 

अन्ततः इज़हार-ए-मोहब्बत जब समाज के समक्ष हुआ, 
तब इस प्रेम के कोमल धागे में कुछ गाँठे पड गई। 

वो उसे पाने के लिये पूरे समाज से लड पडी थी, पर 
जब वो अपनी लड़ाई में फतह की और थी तब तक उसकी  मोहब्बत दम तोड़ चुकी थी। 

अब इश्क की सारी वफाएँ बेवफा हो चुकी थी, 
वो बिलखी, गिड़गिडाई, रोई अपने प्यार और विश्वास के लिये। 

पर उसके इश्क का अन्जाम धोखा ही हुआ, 
और एक मुकम्मल होता खूबसूरत इश्क "नफरत" को भेंट चढ़ गया।। 
                                               ~मनीष सोनी 
                                                 8-02-2019 
                                                 22:36 
                 

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