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Showing posts from November, 2016

नाइन इलेवन / लाल्टू

वह दुनिया की सबसे ऊँची छत थी वहाँ मैं एक औरत को बाँहो में थामे उसके होंठ चूम रहा था किसी बाल्मीकि ने पढा नहीं श्लोक जब तुम आए हमारा शिकार करने हम अचानक ही गिरे जब वह छत हिली एकबारगी मुझे लगा था कि किसी मर्द ने ईर्ष्या से धकेल दिया है मुझे मैं अपने सीने में साँस भर कर उठने को था जब मैं गिरता ही चला मेर चारों ओर तुम्हारा धुँआ था यह कविता की शुरआत नहीं यह कविता का अंत था हमें बहुत देर तक मौका नही मिला कि हम देखते कविता की वह हत्या मेरी स्मृति से जल्द ही उतर गई थी वह औरत जिसे मैं बहुत चाहता था आखिरी क्षणों मे मेरे होठों पर था उसका स्वाद जब तुम दे रहे थे अल्लाह को दुहाई धुँआ फैल रहा था सारा आकाश धुँआ धुँआ था कितनी देर मुझे याद रहा कि मैं कौन हूँ मैंने सोचा भी कि नहीं कि मैं एक जिहाद का नाम हूँ मेर जल रहे होंठ जिनमें जल चुकी थी एक इंसान की चाहत यह कहने के काबिल न थे कि मैं किसी को ढूँढ रहा हूँ वह दुनिया की सबसे ऊँची छत थी मेर जीते जी हुई धवस्त मेर बाद भी बची रह गई थी धरती जिस पर जलने थे अभी और अनिगनत होंठ या अल्लाह!

आत्‍मकथ्‍य / जयशंकर प्रसाद

मधुप गुन-गुनाकर कह जाता कौन कहानी अपनी यह, मुरझाकर गिर रहीं पत्तियाँ देखो कितनी आज घनी। इस गंभीर अनंत-नीलिमा में असंख्‍य जीवन-इतिहास यह लो, करते ही रहते हैं अपने व्‍यंग्‍य मलिन उपहास तब भी कहते हो-कह डालूँ दुर्बलता अपनी बीती। तुम सुनकर सुख पाओगे, देखोगे-यह गागर रीती। किंतु कहीं ऐसा न हो कि तुम ही खाली करने वाले- अपने को समझो, मेरा रस ले अपनी भरने वाले। यह विडंबना! अरी सरलते हँसी तेरी उड़ाऊँ मैं। भूलें अपनी या प्रवंचना औरों की दिखलाऊँ मैं। उज्‍ज्‍वल गाथा कैसे गाऊँ, मधुर चाँदनी रातों की। अरे खिल-खिलाकर हँसतने वाली उन बातों की। मिला कहाँ वह सुख जिसका मैं स्‍वप्‍न देकर जाग गया। आलिंगन में आते-आते मुसक्‍या कर जो भाग गया। जिसके अरूण-कपोलों की मतवाली सुन्‍दर छाया में। अनुरागिनी उषा लेती थी निज सुहाग मधुमाया में। उसकी स्‍मृति पाथेय बनी है थके पथिक की पंथा की। सीवन को उधेड़ कर देखोगे क्‍यों मेरी कंथा की? छोटे से जीवन की कैसे बड़े कथाएँ आज कहूँ? क्‍या यह अच्‍छा नहीं कि औरों की सुनता मैं मौन रहूँ? सुनकर क्‍या तुम भला करोगे मेरी भोली आत्‍मकथा? अभी सम...

बीती विभावरी जाग री / जयशंकर प्रसाद

बीती विभावरी जाग री! अम्बर पनघट में डुबो रही तारा-घट ऊषा नागरी! खग-कुल कुल-कुल-सा बोल रहा किसलय का अंचल डोल रहा लो यह लतिका भी भर ला‌ई- मधु मुकुल नवल रस गागरी अधरों में राग अमंद पिए अलकों में मलयज बंद किए तू अब तक सो‌ई है आली आँखों में भरे विहाग री!