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कब लोगों ने अल्फ़ाज़ के / अख़्तर नाज़्मी

कब लोगों ने अल्फ़ाज़ के पत्थर नहीं फेंके वो ख़त भी मगर मैंने जला कर नहीं फेंके  ठहरे हुए पानी ने इशारा तो किया था कुछ सोच के खुद मैंने ही पत्थर नहीं फेंके  इक तंज़ है कलियों का तबस्सुम भी मगर क्यों  मैंने तो कभी फूल मसल कर नहीं फेंके वैसे तो इरादा नहीं तौबा शिकनी का लेकिन अभी टूटे हुए साग़र नहीं फेंके  क्या बात है उसने मेरी तस्वीर के टुकड़े घर में ही छुपा रक्खे हैं बाहर नहीं फेंके दरवाज़ों के शीशे न बदलवाइए नज़मी लोगों ने अभी हाथ से पत्थर नहीं फेंके

छाया मत छूना / गिरिजाकुमार माथुर

छाया मत छूना मन होता है दुख दूना मन  जीवन में हैं सुरंग सुधियाँ सुहावनी छवियों की चित्र-गंध फैली मनभावनी; तन-सुगंध शेष रही, बीत गई यामिनी, कुंतल के फूलों की याद बनी चाँदनी। भूली-सी एक छुअन  बनता हर जीवित क्षण छाया मत छूना मन होगा दुख दूना मन  यश है न वैभव है, मान है न सरमाया; जितना ही दौड़ा तू उतना ही भरमाया। प्रभुता का शरण-बिंब केवल मृगतृष्‍णा है, हर चंद्रिका में छिपी एक रात कृष्‍णा है। जो है यथार्थ कठिन  उसका तू कर पूजन- छाया मत छूना मन होगा दुख दूना मन  दुविधा-हत साहस है, दिखता है पंथ नहीं देह सुखी हो पर मन के दुख का अंत नहीं। दुख है न चाँद खिला शरद-रात आने पर, क्‍या हुया जो खिला फूल रस-बसंत जाने पर? जो न मिला भूल उसे  कर तू भविष्‍य वरण, छाया मत छूना मन होगा दुख दूना मन