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Showing posts from 2017

छोटी सी मुलाकात / मनीष सोनी

मेरी मुस्कुराहट का वो पल याद आता है, जब उसने मुझे मेरे नाम से पुकारा था हाथों का वो टकराव याद आता है, जब उसने मेरा अभिनंदन किया था मेरी जुबां का वो लड़खड़ाहट पन याद आता है, जब उसने मुझसे वार्तालाप किया था उस शब का वो स्वप्न याद आता है, जहां अकेले थे, हम साथ-साथ।

प्यार का जश्न - कैफ़ी आज़मी

प्यार का जश्न नई तरह मनाना होगा ग़म किसी दिल में सही ग़म को मिटाना होगा काँपते होंटों पे पैमान-ए-वफ़ा क्या कहना तुझ को लाई है कहाँ लग़्ज़िश-ए-पा क्या कहना मेरे घर में तिरे मुखड़े की ज़िया क्या कहना आज हर घर का दिया मुझ को जलाना होगा रूह चेहरों पे धुआँ देख के शरमाती है झेंपी झेंपी सी मिरे लब पे हँसी आती है तेरे मिलने की ख़ुशी दर्द बनी जाती है हम को हँसना है तो औरों को हँसाना होगा सोई सोई हुई आँखों में छलकते हुए जाम खोई खोई हुई नज़रों में मोहब्बत का पयाम लब शीरीं पे मिरी तिश्ना-लबी का इनआम जाने इनआम मिलेगा कि चुराना होगा मेरी गर्दन में तिरी सन्दली बाहोँ का ये हार अभी आँसू थे इन आँखों में अभी इतना ख़ुमार मैं न कहता था मिरे घर में भी आएगी बहार शर्त इतनी थी कि पहले तुझे आना होगा

रात के ख्वाब सुनाएं किस को रात के ख्वाब सुहाने थे / इब्ने इंशा

रात के ख्वाब सुनाए किस को रात के ख्वाब सुहाने थे| धुंधले धुंधले चेहरे थे पर सब जाने पहचाने थे| जिद्दी वहशी अल्हड़ चंचल मीठे लोग रसीले लोग, होंठ उन के ग़ज़लों के मिसरे आंखों में अफ़साने थे| ये लड़की तो इन गलियों में रोज़ ही घूमा करती थी, इस से उन को मिलना था तो इस के लाख बहाने थे| हम को सारी रात जगाया जलते बुझते तारों ने, हम क्यूं उन के दर पे उतरे कितने और ठिकाने थे| वहशत की उन्वान हमारी इन में से जो नार बनी, देखेंगे तो लोग कहेंगे 'इन्शा' जी दीवाने थे|
हिमालय के आँगन में उसे, प्रथम किरणों का दे उपहार  उषा ने हँस अभिनंदन किया, और पहनाया हीरक-हार  जगे हम, लगे जगाने विश्व, लोक में फैला फिर आलोक  व्योम-तुम पुँज हुआ तब नाश, अखिल संसृति हो उठी अशोक  विमल वाणी ने वीणा ली, कमल कोमल कर में सप्रीत  सप्तस्वर सप्तसिंधु में उठे, छिड़ा तब मधुर साम-संगीत  बचाकर बीच रूप से सृष्टि, नाव पर झेल प्रलय का शीत  अरुण-केतन लेकर निज हाथ, वरुण-पथ में हम बढ़े अभीत  सुना है वह दधीचि का त्याग, हमारी जातीयता का विकास  पुरंदर ने पवि से है लिखा, अस्थि-युग का मेरा इतिहास  सिंधु-सा विस्तृत और अथाह, एक निर्वासित का उत्साह  दे रही अभी दिखाई भग्न, मग्न रत्नाकर में वह राह  धर्म का ले लेकर जो नाम, हुआ करती बलि कर दी बंद  हमीं ने दिया शांति-संदेश, सुखी होते देकर आनंद  विजय केवल लोहे की नहीं, धर्म की रही धरा पर धूम  भिक्षु होकर रहते सम्राट, दया दिखलाते घर-घर घूम  यवन को दिया दया का दान, चीन को मिली धर्म की दृष्टि  मिला था स्वर्ण-भूमि को रत्न, शील की सिंहल को भी सृष्टि...

भारत महिमा / जयशंकर प्रसाद

हिमालय के आँगन में उसे, प्रथम किरणों का दे उपहार  उषा ने हँस अभिनंदन किया, और पहनाया हीरक-हार  जगे हम, लगे जगाने विश्व, लोक में फैला फिर आलोक  व्योम-तुम पुँज हुआ तब नाश, अखिल संसृति हो उठी अशोक  विमल वाणी ने वीणा ली, कमल कोमल कर में सप्रीत  सप्तस्वर सप्तसिंधु में उठे, छिड़ा तब मधुर साम-संगीत  बचाकर बीच रूप से सृष्टि, नाव पर झेल प्रलय का शीत  अरुण-केतन लेकर निज हाथ, वरुण-पथ में हम बढ़े अभीत  सुना है वह दधीचि का त्याग, हमारी जातीयता का विकास  पुरंदर ने पवि से है लिखा, अस्थि-युग का मेरा इतिहास  सिंधु-सा विस्तृत और अथाह, एक निर्वासित का उत्साह  दे रही अभी दिखाई भग्न, मग्न रत्नाकर में वह राह  धर्म का ले लेकर जो नाम, हुआ करती बलि कर दी बंद  हमीं ने दिया शांति-संदेश, सुखी होते देकर आनंद  विजय केवल लोहे की नहीं, धर्म की रही धरा पर धूम  भिक्षु होकर रहते सम्राट, दया दिखलाते घर-घर घूम  यवन को दिया दया का दान, चीन को मिली धर्म की दृष्टि  मिला था स्वर्ण-भूमि को रत्न, शील की सिंहल को भी सृष्टि  किसी क...

अजब था उसकी दिलज़ारी का अन्दाज़ / जॉन एलिया

अजब था उसकी दिलज़ारी का अन्दाज़ वो बरसों बाद जब मुझ से मिला है भला मैं पूछता उससे तो कैसे मताए-जां तुम्हारा नाम क्या है? साल-हा-साल और एक लम्हा कोई भी तो न इनमें बल आया खुद ही एक दर पे मैंने दस्तक दी खुद ही लड़का सा मैं निकल आया दौर-ए-वाबस्तगी गुज़ार के मैं अहद-ए-वाबस्तगी को भूल गया यानी तुम वो हो, वाकई, हद है मैं तो सचमुच सभी को भूल गया रिश्ता-ए-दिल तेरे ज़माने में रस्म ही क्या निबाहनी होती मुस्कुराए हम उससे मिलते वक्त रो न पड़ते अगर खुशी होती दिल में जिनका निशान भी न रहा क्यूं न चेहरों पे अब वो रंग खिलें अब तो खाली है रूह, जज़्बों से अब भी क्या हम तपाक से न मिलें शर्म, दहशत, झिझक, परेशानी नाज़ से काम क्यों नहीं लेतीं आप, वो, जी, मगर ये सब क्या है तुम मेरा नाम क्यों नहीं लेतीं 

लाई फिर इक लग़्ज़िशे-मस्ताना तेरे शहर में / कैफ़ी आज़मी

लाई फिर इक लग़्ज़िशे-मस्तानामादक लड़खड़ाहट तेरे शहर में । फिर बनेंगी मस्जिदें मयख़ाना तेरे शहर में । आज फिर टूटेंगी तेरे घर की नाज़ुक खिड़कियाँ आज फिर देखा गया दीवाना तेरे शहर में । जुर्म है तेरी गली से सर झुकाकर लौटना कुफ़्रधर्मविरोधी है पथराव से घबराना तेरे शहर में । शाहनामेफ़ारसी कवि फ़िरदौसी की अमर रचना लिक्खे हैं खंडरात की हर ईंट पर हर जगह है दफ़्न इक अफ़साना तेरे शहर में । कुछ कनीज़ेंदासियाँ जो हरीमे-नाज़प्रेमिका का घर में हैं बारयाबजिसे प्रवेश मिल गया हो माँगती हैं जानो-दिल नज़्राना तेरे शहर में । नंगी सड़कों पर भटककर देख, जब मरती है रात रेंगता है हर तरफ़ वीराना तेरे शहर में ।

कब लोगों ने अल्फ़ाज़ के / अख़्तर नाज़्मी

कब लोगों ने अल्फ़ाज़ के पत्थर नहीं फेंके वो ख़त भी मगर मैंने जला कर नहीं फेंके  ठहरे हुए पानी ने इशारा तो किया था कुछ सोच के खुद मैंने ही पत्थर नहीं फेंके  इक तंज़ है कलियों का तबस्सुम भी मगर क्यों  मैंने तो कभी फूल मसल कर नहीं फेंके वैसे तो इरादा नहीं तौबा शिकनी का लेकिन अभी टूटे हुए साग़र नहीं फेंके  क्या बात है उसने मेरी तस्वीर के टुकड़े घर में ही छुपा रक्खे हैं बाहर नहीं फेंके दरवाज़ों के शीशे न बदलवाइए नज़मी लोगों ने अभी हाथ से पत्थर नहीं फेंके

छाया मत छूना / गिरिजाकुमार माथुर

छाया मत छूना मन होता है दुख दूना मन  जीवन में हैं सुरंग सुधियाँ सुहावनी छवियों की चित्र-गंध फैली मनभावनी; तन-सुगंध शेष रही, बीत गई यामिनी, कुंतल के फूलों की याद बनी चाँदनी। भूली-सी एक छुअन  बनता हर जीवित क्षण छाया मत छूना मन होगा दुख दूना मन  यश है न वैभव है, मान है न सरमाया; जितना ही दौड़ा तू उतना ही भरमाया। प्रभुता का शरण-बिंब केवल मृगतृष्‍णा है, हर चंद्रिका में छिपी एक रात कृष्‍णा है। जो है यथार्थ कठिन  उसका तू कर पूजन- छाया मत छूना मन होगा दुख दूना मन  दुविधा-हत साहस है, दिखता है पंथ नहीं देह सुखी हो पर मन के दुख का अंत नहीं। दुख है न चाँद खिला शरद-रात आने पर, क्‍या हुया जो खिला फूल रस-बसंत जाने पर? जो न मिला भूल उसे  कर तू भविष्‍य वरण, छाया मत छूना मन होगा दुख दूना मन

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो / कैफ़ी आज़मी

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तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो  क्या ग़म है जिस को छुपा रहे हो  आँखों में नमी हँसी लबों पर  क्या हाल है क्या दिखा रहे हो  बन जायेंगे ज़हर पीते पीते  ये अश्क जो पीते जा रहे हो  जिन ज़ख़्मों को वक़्त भर चला है  तुम क्यों उन्हें छेड़े जा रहे हो  रेखाओं का खेल है मुक़द्दर  रेखाओं से मात खा रहे हो 

झुकी झुकी सी नज़र बेक़रार है कि नहीं / कैफ़ी आज़मी

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झुकी झुकी सी नज़र बेक़रार है कि नहीं दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं  तू अपने दिल की जवाँ धड़कनों को गिन के बता मेरी तरह तेरा दिल बेक़रार है कि नहीं वो पल के जिस में मुहब्बत जवान होती है उस एक पल का तुझे इंतज़ार है कि नहीं  तेरी उम्मीद पे ठुकरा रहा हूँ दुनिया को तुझे भी अपने पे ये ऐतबार है कि नहीं