Posts

Showing posts from October, 2016

हम को मन की शक्ति देना / गुलज़ार

हम को मन की शक्ति देना, मन विजय करें दूसरो की जय से पहले, ख़ुद को जय करें।  भेद भाव अपने दिल से साफ कर सकें दोस्तों से भूल हो तो माफ़ कर सके झूठ से बचे रहें, सच का दम भरें दूसरो की जय से पहले ख़ुद को जय करें हमको मन की शक्ति देना।  मुश्किलें पड़े तो हम पे, इतना कर्म कर साथ दें तो धर्म का चलें तो धर्म पर ख़ुद पर हौसला रहें बदी से न डरें दूसरों की जय से पहले ख़ुद को जय करें हमको मन की शक्ति देना, मन विजय करें।

मधुशाला / भाग १ / हरिवंशराय बच्चन

मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला, प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला, पहले भोग लगा लूँ तेरा फिर प्रसाद जग पाएगा, सबसे पहले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला।।१।  प्यास तुझे तो, विश्व तपाकर पूर्ण निकालूँगा हाला, एक पाँव से साकी बनकर नाचूँगा लेकर प्याला, जीवन की मधुता तो तेरे ऊपर कब का वार चुका, आज निछावर कर दूँगा मैं तुझ पर जग की मधुशाला।।२। प्रियतम, तू मेरी हाला है, मैं तेरा प्यासा प्याला, अपने को मुझमें भरकर तू बनता है पीनेवाला, मैं तुझको छक छलका करता, मस्त मुझे पी तू होता, एक दूसरे की हम दोनों आज परस्पर मधुशाला।।३। भावुकता अंगूर लता से खींच कल्पना की हाला, कवि साकी बनकर आया है भरकर कविता का प्याला, कभी न कण-भर खाली होगा लाख पिएँ, दो लाख पिएँ! पाठकगण हैं पीनेवाले, पुस्तक मेरी मधुशाला।।४। मधुर भावनाओं की सुमधुर नित्य बनाता हूँ हाला, भरता हूँ इस मधु से अपने अंतर का प्यासा प्याला, उठा कल्पना के हाथों से स्वयं उसे पी जाता हूँ, अपने ही में हूँ मैं साकी, पीनेवाला, मधुशाला।।५। मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवाला, 'किस पथ से जाऊँ?' असमंजस में है वह भोलाभा...

सरफ़रोशी की तमन्ना / बिस्मिल अज़ीमाबादी

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-कातिल में है करता नहीं क्यूँ दूसरा कुछ बातचीत, देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफ़िल में है ए शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार, अब तेरी हिम्मत का चरचा गैर की महफ़िल में है सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमान, हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है खैंच कर लायी है सब को कत्ल होने की उम्मीद, आशिकों का आज जमघट कूच-ए-कातिल में है सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

शुमार-ए सुबह मरग़ूब-ए बुत-ए-मुश्किल पसंद आया / ग़ालिब

शुमार-ए सुबह मरग़ूब-ए बुत-ए-मुश्किल पसंद आया तमाशा-ए बयक-कफ़ बुरदन-ए सद दिल पसंद आया ब फ़ैज़-ए बे-दिली नौमीदी-ए जावेद आसां है कुशायिश को हमारा `उक़द-ए मुश्किल पसंद आया हवा-ए सैर-ए गुल आईना-ए बे-मिहरी-ए क़ातिल कि अंदाज़-ए ब ख़ूं-ग़लतीदन-ए बिस्मिल पसंद आया रवानियाँ -ए मौज-ए ख़ून-ए बिस्मिल से टपकता है कि लुतफ़-ए बे-तहाशा-रफ़तन-ए क़ातिल पसंद आया असद हर जा सुख़न ने तरह-ए बाग़-ए-तज़ डाली है मुझे रंग-ए बहार-ईजादी-ए बेदिल पसंद आया

नाम बड़े, दर्शन छोटे / काका हाथरसी

नाम-रूप के भेद पर कभी किया है गौर ? नाम मिला कुछ और तो, शक्ल-अक्ल कुछ और शक्ल-अक्ल कुछ और, नैनसुख देखे काने बाबू सुंदरलाल बनाए ऐंचकताने कहँ ‘काका’ कवि, दयाराम जी मारें मच्छर विद्याधर को भैंस बराबर काला अक्षर मुंशी चंदालाल का तारकोल-सा रूप श्यामलाल का रंग है जैसे खिलती धूप जैसे खिलती धूप, सजे बुश्शर्ट पैंट में- ज्ञानचंद छै बार फेल हो गए टैंथ में कहँ ‘काका’ ज्वालाप्रसाद जी बिल्कुल ठंडे पंडित शांतिस्वरूप चलाते देखे डंडे देख, अशर्फीलाल के घर में टूटी खाट सेठ भिखारीदास के मील चल रहे आठ मील चल रहे आठ, कर्म के मिटें न लेखे धनीराम जी हमने प्राय: निर्धन देखे कहँ ‘काका’ कवि, दूल्हेराम मर गए क्वाँरे बिना प्रियतमा तड़पें प्रीतमसिंह बिचारे दीन श्रमिक भड़का दिए, करवा दी हड़ताल मिल-मालिक से खा गए रिश्वत दीनदयाल रिश्वत दीनदयाल, करम को ठोंक रहे हैं ठाकुर शेरसिंह पर कुत्ते भौंक रहे हैं ‘काका’ छै फिट लंबे छोटूराम बनाए नाम दिगंबरसिंह वस्त्र ग्यारह लटकाए पेट न अपना भर सके जीवन-भर जगपाल बिना सूँड़ के सैकड़ों मिलें गणेशीलाल मिलें गणेशीलाल, पैंट की क्रीज सम्हारी- बैग कुली को दिया चले मिस्टर गिरि...

मानव का मन शान्त करो हे / सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"

मानव का मन शान्त करो हे! काम, क्रोध, मद, लोभ दम्भ से जीवन को एकान्त करो हे। हिलें वासना-कृष्ण-तृष्ण उर, खिलें विटप छाया-जल-सुमधुर, गूंजे अलि-गुंजन के नूपुर, निज-पुर-सीमा-प्रान्त करो हे। विहग-विहग नव गगन हिला दे, गान खुले-कण्ठ-स्वर गा दे, नभ-नभ कानन-कानन छा दे, ऐसे तुम निष्क्रान्त करो हे। रूखे-मुख की रेखा सोये, फूट-फूटकर माया रोये, मानस-सलिल-मलिनता धोये, प्रति मग से आक्रान्त करो हे!

न दैन्यं न पलायनम्. / अटल बिहारी वाजपेयी

कर्तव्य के पुनीत पथ को  हमने स्वेद से सींचा है,  कभी-कभी अपने अश्रु और—  प्राणों का अर्ध्य भी दिया है।  किंतु, अपनी ध्येय-यात्रा में—  हम कभी रुके नहीं हैं।  किसी चुनौती के सम्मुख  कभी झुके नहीं हैं।  आज,  जब कि राष्ट्र-जीवन की  समस्त निधियाँ,  दाँव पर लगी हैं,  और,  एक घनीभूत अंधेरा—  हमारे जीवन के  सारे आलोक को  निगल लेना चाहता है;  हमें ध्येय के लिए  जीने, जूझने और  आवश्यकता पड़ने पर—  मरने के संकल्प को दोहराना है।  आग्नेय परीक्षा की  इस घड़ी में—  आइए, अर्जुन की तरह  उद्घोष करें :  ‘‘न दैन्यं न पलायनम्।’’

उन्हें शौक़-ए-इबादत भी है / अकबर इलाहाबादी

उन्हें शौक़-ए-इबादत भी है और गाने की आदत भी निकलती हैं दुआऐं उनके मुंह से ठुमरियाँ होकर  तअल्लुक़ आशिक़-ओ-माशूक़ का तो लुत्फ़ रखता था मज़े अब वो कहाँ बाक़ी रहे बीबी मियाँ होकर  न थी मुतलक़ तव्क़्क़ो बिल बनाकर पेश कर दोगे  मेरी जाँ लुट गया मैं तो तुम्हारा मेहमाँ होकर  हक़ीक़त में मैं एक बुलबुल हूँ मगर चारे की ख़्वाहिश में  बना हूँ मिमबर-ए-कोंसिल यहाँ मिट्ठू मियाँ होकर निकाला करती है घर से ये कहकर तू तो मजनूं है  सता रक्खा है मुझको सास ने लैला की माँ होकर