काश / मनीष सोनी

काश कभी हम मिले ही नहीं होते,
न कभी बातें होती, न मुलाकातें। 

काश मन भी वश में होता और इश्क भी, 
न यादें होती, न इश्क की भीख माँगनी पडती। 

काश ये गमज़दा शबें  गुमशुदा होती, 
न उनके ख्वाब होते, न दुआएँ होती। 

न चर्चें होते, न दिल्लगी, 
न मुस्कुराहट के पीछे दर्द होता, न दिल बिखरते। 

काश कभी हम मिले ही नहीं होते, 
न गज़लें होती, न इश्क का तमाशा बनता। 
                                     
                    ~ मनीष सोनी  
                         25-08-2018 
                           01:09 AM 

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