सफरनामा / मनीष सोनी
अक्सर सुना करता था कि सुबह देखा हुआ स्वप्न सच हो जाता है और अंततः उस दिन भी ऐसा ही कुछ हुआ,
तुम्हारे साथ बिताये हुए वह नौ घंटे छियालीस मिनट शायद ज़िंदगी के बेहतरीन पलो में से एक थे।
उस दिन मैं मेरे और तुम्हारे बचपन की उभयनिष्ठता से अनभिज्ञ हुआ,
वो तुम्हारा छोटी-छोटी बातों में ख़ुशी ढूंढना, अपनी संस्कृति के प्रति तुम्हारे विचार,
ईश्वर के प्रति भाव और छोटो के लिए प्यार, ये सब तुम्हे बाकियो से अलग बनाता है।
वो तुम्हारी झिलमिल सी चंचल आँखे, होंठो को अलंकृत करती मासूम मुस्कुराहट और चेहरे के विभिन्न रस,
उस दिन मैंने जाना की तुम्हारी सुंदरता की नींव तुम्हारी खूबसूरत रूह ही है।
ये एक खूबसूरत सफर था जो की अपनी अंतता लिए हुए था पर मेरा मन उसे अनंतता की और खींचना चाह रहा था॥
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